Monday, May 30, 2011

Try to understand

Try to understand
When you were still in your mother’s womb
the Sahi family of Salegutu had tricked your
parents into thumb printing a plain sheet of
paper, through which he usurped your father’s
land.
Your parents became landless while fighting the case.
When you were in the fourth grade, your father became
a dhangar (??) in the Lappa village.
Your elder brother became a dhangar(servant?) in the house of
a farmer.

Your mother and middle brother became laborers in Ranchi
You and your brother immediately older than you remained at home.

Your life had a new beginning with your two brothers.
Undaunted and unafraid of pouring rains and lightening,
you worked day and night in the fields.
Incessantly working in the fields of the farmers, you plucked spinach in Goda Tand
Alone in the unforgiving sun, you picked karanj underneath the karanj trees.
Or picked kernels of Lah (??) under the Lah tree.
Or at other times, looked for food under Pakar, Dumar, mango, jackfruit and koyanar trees.

You were alone.
But undaunted, you stayed there.
Amassing all the karanj in a towel, and lah in a bundle,
you traveled 5-6 miles to the Raikera market, Turbul market,
or at other times, Bakaspur market to sell the goods you had so assiduously
gathered.
You bought a pound or two of rice from the market, and then with the last ray of Sun
announcing its departure, you came home alone.

Even then you remained there undaunted.
You never complained.
You went to Kotobo school, Ramtolya school, and Kamdara school all alone.
You would cross the overflowing river in pouring rains all alone.
You would travel 10-12 miles under the unbearable heat of an unforgiving sun alone
When your throat was parched with thirst, you would drink from the river
You would relax under the shade of a jamun tree.
Even then, you were alone.
After receiving your diploma for having passed the eighth grade
from Glowshop Memorial High School, Kamdara, you took the train
from Kabaspur to Ranchi to continue your education.

Remember, even then you came alone.
Life in the city, crowds of people,
the dazzle and the glitz, canter on the roads,
the traffic of speeding cars,
everyone is a stranger in this crowd
even then you were alone.

You wanted to continue your studies, but you
did not even know which school you should apply
or where you would live and what you would eat
The only thing you knew, and that kept you going was
that you wanted to study.
Remember, even then you were alone.
A byre became your home
open sky became your roof.
Strangers became your neighbors
Punjabis, Bengalis, Biharis, washermen, servants of the rich,
they all became your comrades
Even then, you were all alone
You applied for admission into Saint Margaret Girls’ High School
You would wash dishes for the policemen on the main road to earn enough to survive
You would sweep their camps every morning.
Even then, you were all alone, weren’t you?
You passed the 9th grade, the 10th grade
and you needed more money.
You would wash dishes, and clothes at various homes before going to school
At times, you would get enough to eat, at others, you would have to go hungry
Remember, even then you were alone
The pen and the pencil which your fingers would constantly grasp, and which came with
you from the village to Ranchi are still with you.

The same paper, the same pen
when you cried, tears would well up in your eyes
These same two hands would wipe them
These same tears would console you
All of them are still with you.
Then why do you complain that
you are alone?
You were born on Tuesday (Mangal)
that is why some called you Mangri
You were born on the full moon (Purnima)
that is why some called you Purnima
Your parents wanted to name you after a grandmother Bandhani
When you went to the Church, they called
you Dayamani, and you liked that name
Hey look... everyone is with you.
Then why do you complain you are alone?
Why do you then feel so?
See, Mangri, Purnima, Bandhani and Dayamani are
all together, and will live together

Sunday, May 8, 2011

NETURE IS OUR HERITAGE


30 April 2011 ko Adivasi Mulwasi Astitva Rakcha Manch ne Sarhul Teyohar Manaya Amma Banay toli me-sakhuwa ped SARNA me puja karte PAGAN -PUJAR



MUDA ADIVASI SAMAJ KA HISTRICAL PAHCHAN...BOWO DIRI..JANHA JANHA MUNDA ADIVASI JANGAL SAF KAR BASTE GAYE ..GAON BASAYE..MARNE PAR UNKE NAM PAR PATHAL KHADA KARTE GAYE..

SARUL ME MANDAR KI THAP PAR THIRAKTE GRAMIN

Monday, November 29, 2010

आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-संकल्प सभा-2
















आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच संकल्प पढ़ते साथी
खूंटी -गुमला
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की बचनब्दता 30 जून 2010
समुन्नत झारखंड और नवझारखंड के लिए आदिवासी मूलवासी अस्त्त्वि रक्षा मंच लगातार संघर्षशील है। हमरा संघर्ष और निर्माण का स्वप्न एक ऐसी जनराजनीति से निर्देशित है जिसकी दिशा हूलगुलान के शहीदों और विचारकों ने ही तय कर दिया था। झारखंड राज्य गठन के बाद हमारी चुनौती और हमारा दायित्व और ज्यादा गहन हो गया है। हमने देखा है कि झारखंड कारपोरेट घरानों के निशासन पर है और झारखंड की अधिकांश राजनीति इन निगमों का पिछलग्गू बन गयी है। यह सारी दुनिया के आदिवासी-मूलवासियों के संसाधनों की लूट कर पूंजीपतियों की आर्थिक संरचना का दौर है। साथ ही जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों का पूंजिपतियों के साथ गांठजोड़ की राजनीति कर यहां के प्रकृतिक संसाधनों का दोहन दिया जा रहा है। ऐसे दौर में आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का साफ मानना है कि हम एक समुन्नत समाज के नवनिर्माण की नई जनराजनीतिक चेतना का विकास के पहल से ही हालात को बदल सकते हैं और इसके लिए हम सब को अपने विचारांे की धार को तेज करना होगा। कोई भी समाज या जनसंगठन बिना विचार के न तो जीवित रह सकता है और न ही वह समकालीन चुनौतियों का पूरी तत्पराता के साथ मुकाबला कर सकता है। हम उन खतरों से वाकिफ हैं जो हमारे इर्दगिर्द मौजूद है। हमारी भाषा, संस्कृति, लोकाचार और हमारी आजीविका की संस्कृति तथा परंपरागत हुनर, तकनीक और कृर्षि-जंगल आधारित आजीविका को न केवल खत्म करने की कोशिश की जा रही है बल्कि इसे अवैज्ञानिक समझ साबित कर विनाशकारी विकास की परियोजनाओं को थोपने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी विकास नीति के पक्ष में बात की जा रही है जिससे न केवल परस्थिकीय संकट खड़ा हुआ है बल्कि धरती और जीवन ही संकटग्रस्त हो गया है। झारखंड की त्रासदी यह है कि झारखंडी समाज और संस्कृति में अंतरनिहित वैज्ञानिक समुन्नति की प्रक्रियाओं और प्रवृतियों को ही खारिज कर देने के लिए माहौल बनाया जा रहा है। इतिहास साक्षी है और हमारे शहीदों के विचार बताते हैं कि झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों ने जिस तरह के लयात्मक समन्वय की सामाजिक चेतना का सृजन किया था उसे और गतिशील बना कर ही संकट का न केवल मुकाबला किया जा सकता है बल्कि झारखंड के नवनिर्माण का भावी मार्ग को भी प्रशस्त किया जा सकता है। झारखंडी जनगण के सामूहिक विवेक और इतिहास चेतना में जिस तरह की राजनीतिक विरासत मौजूद है वह हमारी सबसे बड़ी ताकत है। यह न केवल सामुदायिकता और समानता के मूल्यों पर आधरित जनतंत्र की विरासत है बल्कि इसमें स्त्री पुरूष की समानता का मूल्य जीवंत है. विभिन्न कारकों और सांस्कृतिक हमलोंं के कारण जो विघटन हुआ है उसे पहचानने की जरूरत है और यह समझ स्प’ट करने की जरूरत है कि झारखंड के आदिवासी मूलवासी जनगण का संघर्ष न केवल स्थानीय स्तर पर परंपरा की रूढि़यों और रूकावटोंे खत्म कर एक नए समाज के निर्माण के दिशा में आगे बढ़ने के लिए है और इसके विचार और सिद्धांत के लिए दीर्घकालिक सामाजिक चेतना हमें प्रेरित करती है
झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों का सपना दिनां दिन कठिन होता जा रहा है. झारखंड को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया गया है जहां भविष्य बहुत अंधकारमय दिखता है. इससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता जनसंघर्ष को तेज करना और उसके आधार पर एक नई जनराजनीतिक बहस और चरित्र का निर्माण करना है। हमें यह बताना होगा कि झारखंडी मूल्य और विचार क्या हैं तथा उसे जीवन में किस तरह सार्थक किया जा सकता है। हमारे संगठन को पूरा देश इसी उम्मीद के साथ देख रहा है। हमारे संगठन न केवन दुनिया के सबसे बड़े कारपोरेट को चुनौती दी है बल्कि इस विमर्श को भी अपने मौलिक नारों के माध्यम से खड़ा किया है कि झारखंड की अस्मिता और अस्तित्व का वैज्ञानिक नजरिया क्या है तथा उन्नति के मानक का मतलब क्या है। हमने उस विमर्श को पुनः रेखांकित किया है कि समुन्नति एक प्रकृतिक अवधारणा है और यदि दुनिया के पर्यावरण की हिफाजत करनी है तो विकास के वर्तमान माडल को बदलना होगा। हमारे जनसंगठन ने यह भी स्थापित किया है कि जनसंगठन और जनांदोलन की राजनीति का वास्तविक अर्थ क्या है। हमने अपने अनुभव से सीखा है कि इतिहास केवल प्रेरित ही नहीं करता बल्कि वह गढ़ने की ’शक्ति भी प्रदान करता है और जनसक्रियता के व्यापक संदर्भ न केवल जनगण की राजनीतिक चेतना को उन्नत करते हैं बल्कि उनके इतिहासबोध को और ठोस बनाते हुए भावी समाज के निर्माण की दिशा में ठोस तर्क और प्रवृतियों का सृजन भी करते हैं। हम कह सकते हैं कि हमारी बचनबद्धता झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों की हिफाजत, लोगों की आजीविका संस्कृति को आगे ले जाने, भाषा और विरासत के पुननिर्माण के साथ एक ऐसी जनराजनीतिक चेतना के निर्माण के प्रति है जिससे हूलगुलानों के सपने को जमीन पर उतारा जा सके। हूलगुलानों का सन्देश था कि हमें अपने अस्तित्व को न केवल बचाना है बल्कि उसे गतिशीलता भी रखना है और साथ ही ऐसे सामाजिक मूल्यों के साथ स्वयं को आत्मलीन करना है जिसमें एक ईमानदार और जनतांत्रिक झारखंड गढ़ा जा सके। हमारा अनुभव है कि असली ताकत तो गांवों में है और लोगों में है लेकिन इस ताकत का राजनीतिक इस्तेमाल कर जिस तरह झारखंड की छवि बना दी गयी है उसे बदलना होगा। संताल हूल और बिरसा उलगुलान ने जिस तरह का नेतृत्व विकसित किया था उसी तरह का नेतृत्व हमें भी निर्मित करना होगा। जो समझौताविहीन संघर्ष तथा जनगण के नियंत्रण में हो। हमारा साफ मानना है कि असली राजनीतिक और आर्थिक ताकत जनता में है और किसी भी निर्णय की प्रक्रिया में उसे नजरअंदाज करने की प्रवृति को खतम कर हम वास्तविक स्वशासन की दिशा तय कर सकते हैं।
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के विचार निर्माण की प्रक्रिया जनसमुदायों की इसी समझ से विकसित हुई है. यह कार्यभार हमारे समक्ष है कि हम इस प्रक्रिया और गति प्रदान करें। हम व्यापक लक्ष्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसमें आम आदमी की भूमिका प्रमुख है।
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच जनतांत्रिक मूल्यों पर वि’वास करता है। मंच व्यापक जनसमुदाय की निर्णायक हिस्सेदारी में वि’वास करता है। हमारी सफलता का यही मूख्य कारण है. मंच यह भी मानता है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों से जनगण के व्यापक सपनों को पूरा नहीं किया जा सकता। मंच जनगण की सक्रियता के साथ एक जीवंत समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इतिहास से सीखते हुए हमारा अनुभव यह भी बताता है कि संघर्ष स्थानीय संसाधनों के बल पर ही मंजिल हासिल करता है। हम देख रहे हैं कि झारखंड को विखंडित करने की हर तरह की साजि’ों चल रही हैं. झारखंड की अस्मिता को खत्म करने के षडयंत्र को नाकामयाब करना भी हमरा मकसद है। झारखंड को किसी भी हालत में हम भ्रष्ट तथा लुटेरे लोगों का साम्राज्य नहीं बनने दे सकते।. हूलगुलानों की सीख यही है। हमें साफ तौर पर कहना होगा कि झारखंड ’ाोषकों और लुटेरों का चारागाह नहीं है बल्कि उन करोड़ांे आदिवासियों और मूलवासियों का एक जीवन है जो श्रम की महत्ता का आदर करते हैं तथा लूट की संस्कृति से नफरत करते हैं.। कारपोरेट राजनीति और विकास की कारपोरेट नीतियों को चुनौती देने के लिए हमें अपनी परंपरा के ईमानदार तथा सादगीपूर्ण जीवन को और आगे ले जाने की जरूरत है.। दुनिया को कारपोरेट साजि’ा से बाहर निकाल का जनतांत्रिक उन्नति के रास्ते पर ले जाने के लिए हमें वैकल्पिक नीतियों को जमीन पर उतारने की दि’ाा में कदम बढ़ाना होगा.
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच को मजबूत बनाने की दिशा में हमें सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है. याद रखना चाहिए कि हमें सारा देश गौर से देख रहा है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच झारखंडियों की जनएकता को मजबूत बनाने की एक प्रक्रिया भी है और विचार भी.। साथ ही मंच मानता है कि झारखंड के किसान-कारीगर-कामगारों की व्यापक एकता भी जरूरी है.। जनता को बांटनेवाली विभाजक प्रवृतियों के प्रति हम सबको लगातार सजग रहने की जरूरत है.। झारखंड में विभिन्न तरह के विचारों के सहारे न केवल झारखंडी मूल्यों को लगतार कमजोर किया जा रहा है बल्कि जनता की एकता को तोड़ने के लिए कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं.। इन सबको नाकाम करने का कार्यभार भी मंच का बुनियादी दायित्व है.
इस बात को एक बार और दुहराने की जरूरत है कि जनसंगठन न केवल जनराजनीति को जन्म देता है बल्कि विचारों से लैस जनसंगठन व्यपाक बदलावों की भी दिशा तय करता है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच को और मजबूत बनाते हुए हम अपने संसाधनों की हिफाजत करेंगे और इन संसाधनों से जो अर्थ संरचना उभरती है उसके आधार पर समुन्नत झारखंड की दिशा भी तय करेगे। एक नवझारखंड के नवनिर्माण के ऐतिहासिक दायित्व के प्रति हम सजग हैं और इस मकसद के लिए जनतंत्र को आधार बना कर हमें आगे बढ़ना है।
इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छु से लड़ कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जल-जंगल-जमीन पर हमारा खूंटकटी अधिकार है। हम यहां के मालिक हैं। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया तब-तब यहां विद्रोह उठ खड़ा हुआ। इस राज्य के जलन-जंगल-जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिद्वू-कान्हू, फूलो-झाणो, सिंदराय-बिन्द्रय वीर बिरसा मुंडा , गया मुंडा, माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी ’shahadat दी। इन शहीदों के खून का कीमत है-छोटानागपुर का’तकारी अधिनियक 1908 और संतालपरगना कष्टकारी अधिनियम । इन कानूनों में कहा गया है कि आदिवासी इलाके के जल-जंगल-जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेस नहीं कर सकता है। यहां के जमीन का मालिक नहीं बन सकता है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान में हमारे इस क्षेत्र को bisheshadhikar अधिकार मिला है-यह है पांचवी अनुसूचि क्षेत्र। इसे पांचवी अनुसूची क्षेत्र में जंगल-जमीन-पानी, गांव-समाज को अपने परंपरागत अधिकार के तहत संचालित एवं विकसित एंव नियंत्रित करने को अधिकार है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच इन अधिकारों का सम्मान करता है, और इसकी रक्षा के लिए बचनबद्व है।

संकल्प

1-छोटानागपुर का’तकारी अधिनियम 1908 के मूल धारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिया गया है, इसकी रक्षा के लिए मंच बचनबद्व है।

2-73वे संविधान संशोधन के तहत इस इलाके के ग्राम सभा को जल, जंगल, जमीन, गांव, समाज को संचालित , विकसित तथा नियांत्रित करने का अधिकार प्राप्त है-इसकी रक्षा के लिए मंच हमेशा संघर्ष के लिए तैयार रहेगा।

3-आदिवासी-मूलवासियों का परंपरागत अधिकार जमीन के साथ, जंगल, पहाड़, नदी-नालों, सहित तमाम जलस्त्रोतों पर है, इस पर बाहरी, सरकारी या कंपनियों का हस्तक्षेप मंच कताई स्वीकार नहीं करेगा।

4-विकास योजनाओं में हर आम किसान, महिला एंव युवाओं को बराबरी का भागीदारी बनाने के लिए मंच संघर्ष करेगा।

5-कृर्षि, पर्यावरण के विकास के लिए कारो नदी, छाता नदी, कोयल नदी सहित सभी जलस्त्रोतों का पानी किसानों के खेतों तक लिफट एरिअतिओन के तहत पहुंचाने की व्यवस्था के लिए मंच हर संभव कोशिश करेगा।

6-इस इलाके में किसी तरह की परियोजनाएं, जिससे विस्थापन हो, रोकने के प्रयास जारी रहेगा।

7-विकास से लिए क्षेत्र में कृर्षि तथा वन आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए सरकार पर दबाव देने का लगातार प्रयास किया जाएगा।

8-’शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे घोटालों का रोकने का प्रयास किया जाएगा

9-जनराजनीतिक चिंतन को मजबूदी देने के लिए मंच तत्पर रहेगा-ताकि झारखंड के इतिहास, धरोहर-जंगल-पानी-जमीन, गांव समाज की रक्षा के साथ ही इसका विकास को दिशा दिया जा सके।

10-जाति-धर्म, वर्ग और स्वर्थपरस्त राजनीति से उपर उठकर मंच संघर्ष जारी रखेगा

11-मंच स्थानीय संसाधनों, चंदा, एक एक मुठी धान, चावल के बल पर ही संघर्ष जारी रखेगा

12-हम विकास विरोधी नहीं हैं-विकास चाहते हैं-लेकिन हमारा-जल-जंगल-जमीन, समाज, भाषा-संस्कृतिक के कीमत पर नहीं।

13-पूर्नावास और पूर्नास्थापन नीति एक धोखा है, मंच इसे मीठा जहर मानती है। इसे जो भी स्वीकार करेगा-भविष्य नष्ट होना तय है।

14-पूर्नावास और पूर्नास्थापन नीति उनके लिए बने जो आजादी के बाद विस्थापित हो, बेघर-बार, भूमिंहीन, बेराजगारी, आशिक्षा , बीमारी और कंगाली का जीवन जी रहे हैं। जब तक इन पूर्व में विस्थापितों का पूर्ण एवं आदर्श पुर्नावास नहीं किया जाएगा-झारखंड में किसी तरह का विस्थापन नहीं होने दिया जाएगा।

15-हमारा भाषा-संस्कृति, सामासजिक मूल्यों, धार्मिक अस्था, सरना-ससन दीरी, मंदिर, मश्जिद, गिरजा को किसी पूर्नावास पैकेज से नहीं भरा जा सकता है, और न ही इन ही इनका पूर्नावासित किया जा सकता है।

आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच
संयोजक- प्रखंड समितियां- कर्रा, तोरपा, कमडारा, रनिया

नोट-आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच ने हुलगुलान दिवस सभा में 30 जून 2010 को यह संकल्प पत्र जारी किया।

आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा manch संकप सभा


संकल्प सह हुलउलगुलान दिवस



कंपनियों की जागीर नहीं हमारे पूर्वजों की -झारखंड हमारा है एक इंच जमीन नहीं देगें

जल जंगल जमीन-भाषा संस्कृति, इतिहास, अस्तित्व को बचाने का झारखंड़ का गैरवपूर्ण इतिहास रहा है। 1700 के dashak से 1900 ई0 का दशक अपने अस्तित्व इतिहास बचाने का अंग्रेज साम्राज्यवाद -जमीनदारों के खिलाफ झारखंडियों ने समझौताविहीन संघर्ष का इतिहास रचा। इस संर्घष में आदिवासियों ने अंग्रेज हुकूमत के सामने कभी घुटना नहीं टेका। अंग्रेजों के गोलियों का सामना सिना तान कर किया-लेकिन पीठ दिखाकर कर आदिवासी समाज पीछे कभी नहीं हटा। 30 जून 1856 में संथाली आदिवासियों ने सिद्वू-कान्हू के नेतृत्व में भोगनाडीह में अंग्रेजों के गोलियों का सामना करते हुए-10,000 की संख्या में समुहिक शहादत दिये । 9 जून 1900 में बिरसा मुंडा के आगुवाई में डोम्बारी बुरू में अंग्रेजों के बंदुक के गोलियों को सामना करते हुए 500 लोग ’शहीद हुए।
झारखंड के इतिहास के पनों में जल-जंगल-जमीन, इतिहास-अस्तित्व बचाने का संर्घष के लिए जून महिना -सहिदों का माहिना है। आज जब पूर झारखंड को देशी -बिदेशी पूंजीपति कब्जा जमाने की कोशिश में हैं-ऐसे समय में हम झारखंड़ी आदिवासी-मूलवासियों को अपने पूर्वजों के दिये बलिदान को याद करने की जरूरत है। यही नहीं अपने अस्तित्व की रक्षा के सघर्ष को आगे ले जाने की भी जरूरत है- ताकि हमारा झारखड़ बचा को बचा सकें।
यह जिम्मेवारी हर युवक-युवाती,, महिला-पुरूष, बुधिजीवियो, सामाजिक कार्यकर्ताओं, झारखंडी शुभचिंतकों की है
इसी जिम्मेवारी के साथ आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच अपना संकल्प एक एंच भी जमीन नहीं देगें की आवाज को और बुलंद करने के लिए 29-30 जून 2010 को कनकलोया कोरको टोली में ’संकल्प सह हुलउलगुलान दिवस मनाने का निर्णय लिया है।
नोट-इस अवसर पर संस्कृतिक कार्यक्रम, तीर-धनुष चलान प्रतियोगिता भी होगा। इसमें हर गांव के सभी वर्ग शामिल होगें। अताः हर गांव से अपना गाजा-बाजा के साथ, परंपारिक पहिराव के साथ आयें।


स्थान- कनकलोया कोरको टोली
तिथि-29-30 जून 2010, 29 जून को सुबह 9 बजे तक सभी पहुंचने की कृपा करेगें

निवेदक-आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच

संयांेजक- प्रखंड समितियां- कर्रा, तोरपा, कमडारा, बसिया, रनिय

Tuesday, August 31, 2010

किसी भी कीमत में मित्तल कंपनी को एक इंच भी नहीं देंगे।


हमारे पूर्वजों ने सांप भालू बाघ से इस धरोहर को आबाद किये है, इसकी रक्षा करना हम एक एक की जिमेवारी है। हमरे पूर्वजों की इस धरोहर को किसी भी कीमत में मित्तल कंपनी को एक इंच भी नहीं देंगे।
संकल्प -आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच -खूंटी-गुमला

Monday, August 30, 2010

Wednesday, July 14, 2010